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संस्थागत निपेक्षागार

रिवर गंगा रिपॉज़िटरी


गंगा एक 2,525 किमी लंबी अंतरराष्ट्रीय नदी है, जो उत्तराखंड के हिमालय से निकलकर भारत और बांग्लादेश से होती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है। हिंदू धर्म में देवी गंगा के रूप में पूज्य, यह नदी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है और इसके तटों पर कई ऐतिहासिक नगर फले-फूले हैं। सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व के बावजूद, गंगा विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है, जिससे मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ 140 से अधिक मछली प्रजातियाँ, 90 उभयचर प्रजातियाँ और विलुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन भी खतरे में हैं। गंगा एक्शन प्लान जैसे प्रयास भ्रष्टाचार, कमजोर योजनाओं, तकनीकी कमी और संस्थागत व धार्मिक समर्थन के अभाव के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके हैं।

नदी के पुनर्जीवन में योगदान देने हेतु, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने 17 मई 2016 को मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में रिवर गंगा रिपॉज़िटरी स्थापित की। यह रिपॉज़िटरी गंगा संबंधी साहित्य और शोध को एकत्रित कर व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराती है, ताकि पुनर्जीवन प्रयासों को समर्थन मिल सके। लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह (सेवानिवृत्त), पद्मश्री प्रो. सच्चिदानंद सहाय और डॉ. नबी हसन के मार्गदर्शन में एएमयू इस दिशा में कई परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है।

                                                                         रिवर गंगा रिपॉज़िटरी एक्सेस करने के लिए क्लिक करें



थीसिस और डिसर्टेशन का संस्थागत रिपॉज़िटरी

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) का यह रिपॉज़िटरी विश्वविद्यालय में जमा की गई इलेक्ट्रॉनिक थीसिस और डिसर्टेशन का आधिकारिक डिजिटल संग्रह है। डी-स्पेस प्लेटफ़ॉर्म पर विकसित, यह रिपॉज़िटरी एएमयू के शोध कार्यों को ओपन एक्सेस प्रदान करती है, जिससे दीर्घकालिक संरक्षण, वैश्विक दृश्यता और अकादमिक खोज को सुगम बनाया जा सके।

यह रिपॉज़िटरी संकायों, विभागों और केन्द्रों के अनुसार समुदायों में संरचित है, जिससे उपयोगकर्ता आसानी से संग्रहों को ब्राउज़ कर सकते हैं। उन्नत खोज सुविधाएँ लेखक, विषय, तिथि और पूर्ण-पाठ उपलब्धता के आधार पर खोज की अनुमति देती हैं। हजारों दस्तावेज़ों की ऑनलाइन उपलब्धता के साथ, यह रिपॉज़िटरी शोध, मूल्यांकन और ज्ञान-वितरण का एक मजबूत साधन है। यह एएमयू की डिजिटल स्कॉलरशिप, पारदर्शिता और ओपन एजुकेशनल रिसोर्सेज़ के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। थीसिस और डिसर्टेशन को संकलित कर संरक्षित करने से, यह रिपॉज़िटरी एएमयू के वैश्विक अकादमिक योगदान को और मजबूत बनाती है।


अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गज़ट रिपॉज़िटरी

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गज़ट, जिसे प्रारंभ में 1866 में सर सैयद अहमद ख़ाँ ने प्रकाशित किया था, 19वीं शताब्दी में भारतीय मुसलमानों के बौद्धिक और शैक्षिक पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण माध्यम था।

30 मार्च 1866 को "अलीगढ़ इंस्टिट्यूट गज़ट" साप्ताहिक पत्र के रूप में "Scientific Society of Aligarh" के तहत जारी हुआ, जिसका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता, आधुनिक ज्ञान का प्रसार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास और सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर तार्किक संवाद को बढ़ावा देना था।

1921 में इसका नाम मुस्लिम यूनिवर्सिटी गज़ट और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गज़ट रखा गया।

हालाँकि इसकी प्रसार संख्या लगभग चार सौ के आसपास थी, लेकिन गज़ट ने जनमत निर्माण पर गहरा प्रभाव डाला। इसने अलीगढ़ आंदोलन को गति देने और साइंटिफिक सोसाइटी के संदेश को व्यापक जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुख्यतः उर्दू में लिखी गई, तथा कुछ अंश अंग्रेज़ी में प्रकाशित, इस पत्रिका में समकालीन मुद्दों पर लेख, वैज्ञानिक रचनाओं के अनुवाद, तथा शिक्षा, राजनीति और सामाजिक सुधार पर विचार शामिल थे। इसने अलीगढ़ आंदोलन के वैचारिक निर्माण में अहम योगदान दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1875 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना हुई, जो आगे चलकर 1920 में अलigarh Muslim University बना।

इस पत्रिका के माध्यम से सर सैयद का उद्देश्य 1857 के बाद के दौर में भारतीय मुसलमानों और ब्रिटिश सरकार के बीच संवाद स्थापित करना तथा समुदाय को आधुनिक शिक्षा अपनाने के लिए प्रेरित करना था। आज अलीगढ़ गज़ट दक्षिण एशियाई पत्रकारिता, सुधार साहित्य और शैक्षिक इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।


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